मनुष्य की आंख कितने मीटर की होती है?HealthPlanet

Posted on Fri 16th Dec 2022 : 11:26

मानव आंखे कितने मेगा पिक्सेल की होती है ? इसे और विस्तार से समझने की कोशिश करते है।
वास्तव में यह एक उलझन भरा प्रश्न है की मानव आँखों की क्षमता कितनी है। वास्तव में आँखों की सही और पुर्णतः सटीक क्षमता बता पाना फ़िलहाल मुमकिन ही नही कोई भी विश्वसनीय साइंस सोर्स आँखों की MP क्षमता सटीक नही बताता फिर भी अधिकांश जगहों पर उत्तर मिलता है 576 मेगापिक्सेल। परन्तु इसे ऐसे ही नहीं समझ जा सकता है।
मानव आँख किसी कैमरा की तरह ही काम करती है और किसी कैमरा में तीन मुख्य भाग होते है।
1. लेंस या प्रकाशीय यन्त्र जो प्रकाश को एकत्रित कर छवि का निर्माण करता है।
2. सेंसर जो छवि के प्रकाशीय ऊर्जा को विद्युत संदेशो या सिग्नल्स में बदलता है।
3. प्रोसेसर, जो उन विद्युत सिग्नल्स को वापस स्क्रीन पर छवि में बदल कर दिखाता है।
परंतु हमारी आँखें एक परिपूर्ण कैमरा नहीं है यह केवल कैमरा का पहला भाग हैं। मानव नेत्र केवल सामने से आने वाले प्रकाश को ग्रहण कर एक तस्वीर बनाने की क्षमता रखती है। इस बनायी गयी तस्वीर को समझने का कार्य मस्तिष्क का एक खास हिस्सा करता है जोकि वास्तव में सेसंर और प्रोसेसर दोनों का काम करता है।
चलिए इसे एक उदाहरण से समझते हैं।
आपके पास स्मार्ट फोन में जो कैमरा होता है उसकी क्षमता कितनी है?
5 MP, 8 MP, 13 MP या 20 MP
पर क्या आपको ये पता है कि आपके स्मार्ट फोन कैमरे का सेंसर किस आकार का है?
अधिकतर स्मार्ट फोन के सेंसर 1/3.2 इंच के आकार का होता है और यही कैमरे का वो भाग है जिस पर ली गई तस्वीर की गुणवत्ता निर्भर करती है। इसी लिए स्मार्टफोन कैमरा किसी डिजिटल SLR कैमरे का मुकाबला नहीं कर सकता है। क्योंकि समान मेगापिक्सेल होने के बावजूद भी DSLR कैमरे में सेंसर का आकार काफी बड़ा होता है। इसीलिए एक 8-10 MP का फुल फ्रेम DSLR कैमरा किसी 40 MP के स्मार्ट फोन कैमरे से अच्छी तस्वीर बना सकता है।
इसी प्रकार से मानव आँख जो प्रकाश ग्रहण करके छवि निर्माण करती है उस छवि की प्रोसेसिंग करने के लिए इसी तरह के सेंसर की जरूरत होती है और मानव शरीर में यह सेंसर आँख में ना होकर मस्तिष्क में होता है जहां तक आँखों से प्राप्त प्रकाशीय सिग्नल्स तंत्रिका तंत्र के द्वारा संचालित खास प्रकाशीय तंत्रिकाओं (optic nerves) के द्वारा पहुंचाया जाता है। इसके मस्तिष्क ही इस जानकारी को समझकर एक छवि का निर्माण करता है।
एक मानव आँख में लगभग 30 पुर्जे या कहिये 30 अलग अलग हिस्से होते हैं जो कि किसी छवि का निर्माण करते हैं। परंतु केवल छवि निर्माण जो ग्रहण किये गये प्रकाश की मात्रा और आँखों की कार्यकुशलता पर निर्भर होता है।
कोई व्यक्ति दो प्रकार से नेत्रहीन हो सकता है या तो उसकी आँखों में कोई कमी आ गई हो या उसके दिमाग का वो हिस्सा जो छवि प्रोसेसिंग करता है वो खराब हो गया हो। आपने सुना भी होगा कि जो लोग जन्मांध होते हैं उनकी आँखें बदलने पर भी वो कुछ देख नहीं पाते क्योंकि उनके अंधेपन का कारण उनके खराब या विकृत मस्तिष्क के उस भाग से होता है जो आँखों से मिले संदेश को हमें दिखाता है।
अब बात आती है आँखों की क्षमता की क्या यह वास्तव में 576 MP हैं? तो यहां स्थिति यह है कि मेगा पिक्सल दो राशियों का पैमाना हो सकती है। प्रकाशीय यंत्र की क्षमता अर्थात कि कोई प्रकाशीय यंत्र कितने बड़े क्षेत्रफल को एक बार में देख सकता है यह क्षेत्रफल भी मेगापिक्सेल में मापा जा सकता है।
दूसरा उस सेंसर की जो छवि को प्रोसेस करता है।
अब मानव आँख तो एक बार में 576 MP का क्षेत्रफल देख लेती है परंतु हमारा मस्तिष्क इसे एक साथ प्रोसेस नहीं कर पाता वह केवल थोड़े से ही हिस्से को ही हाई डेफिनेशन में प्रोसेस कर पाता है। इसीलिए किसी भी घटना को सही तरीके से देखने के लिए हमें अपनी आंखों को उस ओर घुमाना पड़ता है। यहां पर हम यह भी कह सकते हैं कि हमारा मस्तिष्क आँखों के दिये गये सिग्नल्स समझने में थोड़ा कमजोर होता है इसीलिए हम आसानी से दृष्टिभ्रम का शिकार हो जाते हैं। लगातार किसी बारीक काम को करने से जिसमें आँखों का ज्यादा इस्तेमाल हो, हमारा सिर दर्द करने लगता है।
इस लेख पर एक प्रश्न मैंने पढ़ा था कि जब मस्तिष्क ही छवि निर्माण को पूरा करता है तो हमें खराब कांच (घिसा कांच) से देखने पर धुंधला क्यों दिखाई देता है?
सर्वप्रथम, कांच पारदर्शी होते है इसका मतलब है ज्यादातर प्रकाश कांच के आरपार निकल सकते है जब हम कांच को घिस देते है तो यह कांच अर्द्ध पारदर्शी हो जाते है जिससे काफी प्रकाश की मात्र इसके आरपार नही आ सकती अर्थात प्रकाश की बड़ी मात्रा कांच से परावर्तित हो जाती है।जब इस तरह की घिसी कांच आँखों के आगे रखी जाय तो आँखों तक कम प्रकाश की मात्रा पहुँचेगी, इसी कारण आँखों को मिलने वाली सूचनाएं भी अपर्याप्त मात्रा में होगी। हमारा मस्तिष्क ज्यादातर देखने का काम केवल आँखों से मिलने वाली सूचनाओं के आधार पर ही करता है अगर सूचनाएं अपर्याप्त होगी तो मस्तिष्क सही छवि नहीं बना पायेगा और यदि सूचनाएं जरूरत से अधिक होगी तो भी मस्तिष्क सही से प्रोसेसिंग नहीं कर पायेगा।
इसे समझने के लिए एक छोटा सा प्रयोग आप घर पर करके देख सकते हैं।
एक A4 आकार का सफेद कागज ले। उसकी फोटो अपने स्मार्टफोन से लेकर सेव करले। अब इस कागज को अलग अलग रंगों से सराबोर कर दे। इसके बाद फिर से एक फोटो ले। अब दोनों फोटो द्वारा आपके स्मार्ट फोन में लिये गये स्पेस को देखे। रंगीन तस्वीर ज्यादा सूचनाएं लिए होती है तो उसका आकार सफेद तस्वीर की तुलना में ज्यादा होता है। अगर आप भी किसी ज्यादा सूचनाओं वाले दृश्य को देखते हैं तो आपका मस्तिष्क भी अधिक जानकारी के कारण दृष्टिभ्रम पैदा कर देता है। इस स्थिति में भी आँखें अपनी पूरी क्षमता पर होती है पर मस्तिष्क ही इसे समझने में असमर्थ होता है।हमारा मस्तिष्क छवियों की रूपरेखा और वस्तुओं की पहचान करने में काफी अच्छा है लेकिन कभी-कभी उसे भी दृष्टि भ्रम(Optical Illusion) हो जाता है। कोई वस्तु वास्तव में मौजूद न हो तब भी हमारा मस्तिष्क उसे देखकर धोखा खा सकता है।
हमारा मस्तिष्क छवि निर्माण करता है इसका अनुभव आप इस बात से कर सकते हैं कि सपने आपको बंद आँखों से ही दिखाई देते हैं जहां पूरी क्रिया मस्तिष्क द्वारा ही होती है।

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